Sunday, February 24, 2019

गुफ़्तगू ख़ुदा से...



मेरे ख़ुदा ने पूछा मुझसे
बता मेरे बंदे तेरी रज़ा क्या है?
क्या चाहिए तुझे,
तेरी तमन्ना क्या है?
मैंने मुस्कुरा के कहा,
तुझसे क्या छुपा है?
पर देने वाला पूछता कहां हैं

तमन्ना है मेरी
तू अपना बना ले मुझको यूँ
मैं तुझमें ही मिल जाऊं
तुझे इबादत बना लूं अपनी
तू मुझमे बेखुद हो जाए
और मैं तुझमे ख़ुदा हो जाऊं

पर मैं समझता हूँ
तेरे पूछने का सबब
कि तू भी जानता है
जो ख़्वाहिश है मेरी
तू पूरी कर ना सकेगा
जो चाहिए मुझे
तू चाह के भी दे ना सकेगा

पर डर मत मेरे ख़ुदा
ये तेरे मेरे बीच की बात है
तू मेरी तमन्ना पूरी कर ना सका
किसी को पता ना चलेगा
नहीं होगी तेरी बदनामी
तेरी ख़ुदाई से
किसी का भरोसा ना उठेगा

ख़ुदा को कुछ तसल्ली हुई
थोड़ी खुशी भी शायद
बोला, ये सच है
जो चाहिए तुझे, मैं दे नही सकता
तमन्ना तेरी पूरी कर नहीं सकता
मैं मजबूर हूँ, तेरा ख़ुदा तो हूँ पर
दिलों पर मेरी मर्ज़ी कहां चलती है?

तुझे जीना है यूँ ही
तेरी तड़प की उम्र बाक़ी है अभी
मुझसे अलग ही रहना है
जब तक ये जिंदगी फ़ना ना हो जाए
तब तक जिये जा
मेरे इंतज़ार में
मिलेंगे जब हम
दुनिया के उस पार में

तब तक तू कुछ और मांग मुझसे
खुशी होगी, गर मैं दे सकूंगा
तेरी पहली तमन्ना ना सही
दूसरी पूरी कर सकूंगा
दिल पसीज गया मेरा
तरस आ गया अपनें ख़ुदा पर
आखिर मैं इंसान हूँ, ख़ुदा तो नहीं
 
मेरी दूसरी तमन्ना सुन ख़ुदा मेरे
जो हो सके तो पूरी कर दे
कि आज कुछ ऐसा हो जाए
मै एक ग़ज़ल लिखूं
तू उसे तरन्नुम दे दे
अपने लबों पे सजा कर
मेरी ग़ज़ल मुख़्तलिफ़ कर दे

चुप रहा ख़ुदा मेरा
बोला कुछ भी नही
ना हामी भरी, ना इन्कार किया
चुपचाप ही चला गया
और छोड़ गया इंतज़ार
उसके जवाब का
और मेरी ज़िंदगी की धुन का...

Sunday, February 17, 2019

उम्र

उम्र कभी बढ़ती है क्या?
ये तो वक़्त की वो जमा पूंजी है
जो ज़िंदगी के बाज़ार में
हर पल ख़र्च हो रही है
सस्ते महंगे दामों में
लम्हे देकर
दर्द और तजुर्बा
खरीदने के लिए

उम्र कभी बढ़ती है क्या?
ये विरासत में मिली
बिना ब्याज का फिक्स डिपोज़िट है
जो थोड़ी थोड़ी किस्तों में 
टूट के मिलती है
जैसे जैसे ज़रूरत पड़ती है साँसों की
सफ़र के अलग मुक़ाम पर

अगर ये उम्र नहीं बढ़ती
तो फिर कपड़े छोटे कैसे हो जाते हैं?
जूते क्यों काटते हैं पैरों को?
नज़र की रोशनी कम क्यूँ होती है?
कहीं ऐसा तो नही
कि जिस्म बढ़ता है
फिर पिघलता है
मिट्टी मे मिलता है
जैसे जैसे उम्र छोटी होने लगती है...

Saturday, February 16, 2019

पुलवामा से ऐलान

हमारा रुख़ अगर बदला, तुम्हें माक़ूल ना होगा
चलेगी आँधियाँ  ऐसी, तुम्हारा धूल ना होगा
जो हर मौसम में अपनी ही धरा में शूल बोते हैं
वहाँ होगी नहीं मिट्टी, वहाँ पर फूल ना होगा...


तुम्हें सहने की हर सीमा को तुमने पार कर डाला
लगाया जब गले हमने, पीठ पर वार कर डाला
तुम्हें भारत की इस दरियादिली को भूलना होगा
नहीं तो आँधियाँ होंगी, तुम्हारा धूल ना होगा...


नाम में पाक है तेरे, काम नापाक करता है
ज़ुबाँ से फूल बरसाये, छुपा कर घात करता है
तेरी फ़ितरत में धोखा है तो तू महफ़ूज़ ना होगा
चलेगी आँधियाँ ऐसी, तुम्हारा धूल ना होगा...


तुम्हें अब नींद ना आएगी, वादा हम ये करते हैं
ख़्वाब तुमको डरायेंगे, इरादा हम ये करते हैं
जो काटोगे नसें अपनी, ख़ून एक बूँद ना होगा
चलेगी आँधियाँ ऐसी, तुम्हारा धूल ना होगा...


बहुत ही जल्द आएंगे, ज़रा होशियार रहना तुम
क़यामत फिर से ढ़ायेंगे, कफ़न तैयार रखना तुम
चीर देंगे तेरी छाती, तुझे मालूम ना होगा
चलेगी आँधियाँ ऐसी, तुम्हारा धूल ना होगा...


जो तू बारूद पे बैठा है ख़ुद चिंगारियाँ लेकर
तो कैसे चैन से बैठेगा, सब दुश्वारियाँ देकर
तू कट जाएगा दुनियाँ से वो दिन भी दूर ना होगा
चलेगी आँधियाँ ऐसी, तुम्हारा धूल ना होगा...

Thursday, February 14, 2019

तुम





सुबह सुबह की बारिश तुम
ख़ुदा की कोई साज़िश तुम
बूंदों  की  आहट में  तुम हो
मौसम  की  फ़रमाइश  तुम

हल्की-हल्की धूप तुम्हीं हो
बादल का रंगरूप तुम्हीं हो
आसमान  सतरंगा  तुम हो
अब्र की  हो  आराइश  तुम

उड़े जो पंछी, चहक में तुम
फूलों की  हर महक में तुम
दुनियाँ के हर शय में तुम हो
हर शय की अफ़्ज़ाइश तुम

चाँद का हर दीदार तुम्हीं हो
यादों  की  बौछार  तुम्हों हो
मरने के  अरमान में तुम हो
जीने  की हो  ख़्वाहिश तुम

जश्न का हर लम्हा तुमसे है
तन्हा  दिल  तन्हा  तुमसे है
मिलने की हसरत में तुम हो
वक़्त से मेरी  गुज़ारिश तुम

जनम जनम का रिश्ता तुम
तुम्हीं  इबादत,  सजदा तुम
ख़ुदा से मेरी चाह में तुम हो
रब से  मेरी  सिफ़ारिश तुम

Sunday, February 10, 2019

लफ़्फ़ाज़ियाँ शुरू



शुरुआत किया है लिखने का
अल्फ़ाज़ की क़ीमत क्या होगी?
आग़ाज़ की फ़ितरत ऐसी है
अंजाम की हसरत क्या होगी?

जिसने मोहलत दी लिखने की
उस वक़्त की रहमत क्या होगी?
मुझको सुनना बर्दाश्त किया
अपनों की ज़हमत क्या होगी?

जो दुआ तहेदिल से निकली
उस दुआ की शोहरत क्या होगी?
बिना मन्नत के ही सब पाया
तो रब की इबादत क्या होगी?