उम्र कभी बढ़ती है क्या?
ये तो वक़्त की वो जमा पूंजी है
जो ज़िंदगी के बाज़ार में
हर पल ख़र्च हो रही है
सस्ते महंगे दामों में
लम्हे देकर
दर्द और तजुर्बा
खरीदने के लिए
उम्र कभी बढ़ती है क्या?
ये विरासत में मिली
बिना ब्याज का फिक्स डिपोज़िट है
जो थोड़ी थोड़ी किस्तों में
टूट के मिलती है
जैसे जैसे ज़रूरत पड़ती है साँसों की
सफ़र के अलग मुक़ाम पर
अगर ये उम्र नहीं बढ़ती
तो फिर कपड़े छोटे कैसे हो जाते हैं?
जूते क्यों काटते हैं पैरों को?
नज़र की रोशनी कम क्यूँ होती है?
कहीं ऐसा तो नही
कि जिस्म बढ़ता है
फिर पिघलता है
मिट्टी मे मिलता है
जैसे जैसे उम्र छोटी होने लगती है...
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