Tuesday, March 26, 2019

पिंजरे का पंछी

खिलता सूरज, खुला आसमान है
आज मौसम भी बड़ा मेहरबान है
आँखों में उम्मीदों के कजरारे सपनें
और होठों पर चमकती मुस्कान है

निकल पड़ी वो घोंसले से अपने
रास्ता नया, बिल्कुल अनजान है
फिर एक आज़ाद पंछी की तरह
पंख पसारे अपने, लगाया उड़ान है

तैरती रही ठंडी हवाओं में देर तक
आसमान के ऊपर जैसे भगवान है
सारे गली मोहल्ले एक से हो गये
अपना सा लगता ये सारा जहान है

घरों में बैठे पंछी ज़ोर से चहचहाये
जब गोली का एक शोर घमासान है
सारे एक साथ कुछ यूं उड़ गये
जैसे ख़तरे में उन सबकी जान है

गोली उसे छूकर उड़ गई थी हवा में
दाहिना पंख उसका लहू-लुहान है
गिरने लगी ज़मी पे बिना पैराशूट के
उसके दर्द में कराहते सारे अरमान हैं

होश में आई तो थी छोटे से पिंजरे में
खुश था बहेलिया, देख के ईनाम है
पूछा उसने कि ख़ता क्या थी मेरी
किस बात की सज़ा मुझे फ़रमान है

बहेलिया बोला तू बड़ी पसंद है मुझे
ये सज़ा नही है, तू मेरे घर की शान है
तू पंछी है, मेहनत लगी क़ैद करने में
लड़की हो तो ब्याह के लाना आसान है

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