अच्छा ख़ासा इंसान था मैं भगवान बनाने क्यूँ आए
ना इधर रहा ना उधर हुआ, श्रीमान बनाने क्यूँ आए
जो गिरेबान में अपने ही ना झाँक सके तो फिर मेरा
अपने जितना ही गिरा हुआ ईमान बनाने क्यूँ आए
पाँच बरस पहले भी तुमने हवामहल बनवाया था
फिर से सरकारी काग़ज़ पर मकान बनाने क्यूँ आए
हमको तो भूखे रोने की आदत है अब जहाँपनाह
लालच देकर रोटी की मुस्कान बनाने क्यूँ आए
लूट के कौड़ी कौड़ी तुमने जेब तो ख़ाली कर ही दी
फिर हमरी बस्ती में मँहगी दुकान बनाने क्यूँ आए
पिछले वादे अब तक पूरे हुए ना सत्तर सालों के
फिर से ख़्वाब दिखाकर यूँ अरमान बनाने क्यूँ आए
जब मेरी तक़लीफ़ से तुमको लेना देना कुछ ना था
अब तुम उसी मुसीबत से पहचान बनाने क्यूँ आए
धूल झोंक कर आँखों में तुम राज करोगे फिर हमपे
अपनी ताक़त से हमको अंजान बनाने क्यूँ आए
शिकार करे कोई भी लेकिन बाँट के खाते हो सारे
फिर हमको ही लड़ने का सामान बनाने क्यूँ आए
देशप्रेम का तमगा ख़ुद ही लगाकर अपने माथे पर
हमको अपने मुल्क में ही मेहमान बनाने क्यूँ आए
एक साथ मिल-जुलकर हमनें जैसे ही रहना सीखा
वोट की ख़ातिर पंडित और पठान बनाने क्यूँ आए
हमको ही भड़का कर हमको हमसे ही कटवाते हो
तुम हर गली-गली को कब्रिस्तान बनाने क्यूँ आए
वोट हमारा हक़ है, कोई भीख नहीं जो दें तुमको
हाथ जोड़कर तुम इसको वरदान बनाने क्यूँ आए
इस बार सुधर जाओ सारे सत्ता के भूखे हैवानों
फिर मत कहना हम तुमको इंसान बनाने क्यूँ आए
बेहतरीन शब्दांजलि
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